Monday, October 11, 2010
Sunday, October 10, 2010
सच के लिए जेल भी मंजूर
सलीम को परेशां करने की वजह से एसपी की तनख्वाह से छः हजार रुपए काटे गए।
सच जानना चाहा तो हाल यह हो गया की घर छुटा, बच्चों की बधाई छूटी, झूठे मुकदमों मैं जेल कटी और जब इससे भी पुलिस का मन नहीं भरा तो इंतनी धारों में मुकदमे लादे की परिवार समेत आरटीआई के एक सिपाहइ को खुद को तड़ीपार करना पड़ा गया यानी पुरे एक साल से ज्यादा वक़्त तक घरबार छोड़कर फरार रहना पड़ा। मुरादाबाद के भोजपुर इलाके के रहने वाले सलीम बेग ने सूचना के अधिकार कानून का सहारा लेकर हारी जंग जीती। मनारेगा योजनाओं में भष्टाचार का मामला हो या फिर स्थानीय गैस एजेंसी में फर्जी कनेक्शनों की बात हो। सलीम ने सच को उजागर करने की अपनी जंग तमाम मुश्किलों के बाद भी जारी राखी। पुलिस में जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का खामियाजा यह हुआ की सलीम को १८ दिन जेल की सीखचों के पीछे गुजारने पड़े। सलीम ने पुलिस भर्ती में आय आवेदनों और भर्ती के मापदंडों पर सवाल पूछने की हिमाकत की तो पुलिस ने पहले तो उनसे सूचनाओं के लिए लाखों रुपे की मांग कर डाली। सूचना देने में टालमटोल हुई तो सलीम राज्य सूचना आयोग चले गए और नतीजा यह हुआ की तत्कालीन एसपि देहात पर जुलाई २००७ में २५ हजार रुपए का जुरमाना लग गया। तिलामिल्लाई पुलिस ने सलीम पर मुकदमों की बोछार कर दी। मामला एक बार फिर अदालत पहुंचा और सलीम को परेशान करने की वजह से एसपी की तनख्वाह से छः हजार रुपए काटे गए। इसके बाद तो पुलिस ने सलीम को परेशान करने के लिए हर हथकंडा आजमाया। नतीजा यह हुआ कि पुलिसिया कहर से बचने के लिए सलीम को डेढ़ साल भोजपुर से बाहर रहना पड़ा। गैगस्टर एक्ट में दर्ज गैंग और उनके सदस्यों कि जानकारी के साथ ही पुलिस हिरासत में मरने वाले लोगों कि भी तादाद सलीम ने पुलिस विभाग से पूछी। इतना ही नहीं यूपी सरकार की ओर से मायावती के जन्मदिन पर छोड़े गे कड़ीयों के बारे में भी जानकारी मांगी। पुलिस और प्रशासन की लाख ज्यादतियों को झेलने के बाद भी सलीम सच्चाई के रस्ते पर निडर होकर चाले जा रहे है।
सच जानना चाहा तो हाल यह हो गया की घर छुटा, बच्चों की बधाई छूटी, झूठे मुकदमों मैं जेल कटी और जब इससे भी पुलिस का मन नहीं भरा तो इंतनी धारों में मुकदमे लादे की परिवार समेत आरटीआई के एक सिपाहइ को खुद को तड़ीपार करना पड़ा गया यानी पुरे एक साल से ज्यादा वक़्त तक घरबार छोड़कर फरार रहना पड़ा। मुरादाबाद के भोजपुर इलाके के रहने वाले सलीम बेग ने सूचना के अधिकार कानून का सहारा लेकर हारी जंग जीती। मनारेगा योजनाओं में भष्टाचार का मामला हो या फिर स्थानीय गैस एजेंसी में फर्जी कनेक्शनों की बात हो। सलीम ने सच को उजागर करने की अपनी जंग तमाम मुश्किलों के बाद भी जारी राखी। पुलिस में जारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का खामियाजा यह हुआ की सलीम को १८ दिन जेल की सीखचों के पीछे गुजारने पड़े। सलीम ने पुलिस भर्ती में आय आवेदनों और भर्ती के मापदंडों पर सवाल पूछने की हिमाकत की तो पुलिस ने पहले तो उनसे सूचनाओं के लिए लाखों रुपे की मांग कर डाली। सूचना देने में टालमटोल हुई तो सलीम राज्य सूचना आयोग चले गए और नतीजा यह हुआ की तत्कालीन एसपि देहात पर जुलाई २००७ में २५ हजार रुपए का जुरमाना लग गया। तिलामिल्लाई पुलिस ने सलीम पर मुकदमों की बोछार कर दी। मामला एक बार फिर अदालत पहुंचा और सलीम को परेशान करने की वजह से एसपी की तनख्वाह से छः हजार रुपए काटे गए। इसके बाद तो पुलिस ने सलीम को परेशान करने के लिए हर हथकंडा आजमाया। नतीजा यह हुआ कि पुलिसिया कहर से बचने के लिए सलीम को डेढ़ साल भोजपुर से बाहर रहना पड़ा। गैगस्टर एक्ट में दर्ज गैंग और उनके सदस्यों कि जानकारी के साथ ही पुलिस हिरासत में मरने वाले लोगों कि भी तादाद सलीम ने पुलिस विभाग से पूछी। इतना ही नहीं यूपी सरकार की ओर से मायावती के जन्मदिन पर छोड़े गे कड़ीयों के बारे में भी जानकारी मांगी। पुलिस और प्रशासन की लाख ज्यादतियों को झेलने के बाद भी सलीम सच्चाई के रस्ते पर निडर होकर चाले जा रहे है।
नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे
//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जलकुकड़े देखना हो तो कोई भारत आए। अब बताइये, दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र की सबसे ताकतवर संस्था के सदस्यगण, महँगाई के बोझ से दबकर टेढ़े होने से बचने के लिए अगर अपनी पगार खुद बढ़ा लेते हैं तो इसमें जलने की क्या बात है। यह हमारे देश देश की विशेषता है, किसी को कुछ ज़्यादा ही हासिल हो जाए, भले ही वह तनख्वाह हो, बख्शीस हो, लूट में हिस्सा हो, भीख हो........तो दूसरे लोग धूँ-धूँ कर जलने लगते हैं।
देश के नेतृत्व की तनख्वाह बढ़ी देख जो ज्वलनशील लोग जल रहे हैं उनमें ज़्यादातर वे लोग हैं जो खुद भी तनखैये हैं और जिन्हें अपनी तनख्वाह खुद बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। इन तनखैयों की भी बढ़ जाती, भले ही उतनी ना बढ़ती जितनी जनसेवकों की बढ़ी है, तो जलने की यह क्रिया उतनी लपटदार नहीं होती जितनी होती देखी जा रही है।
अरे जलकुकड़ों, ज़रा शर्म करो ! यह भी कोई बात होती है, आखिर वे देश के कर्णधार हैं, दाल उनके लिए भी सौ रुपए किलो हुई है, सब्ज़ियाँ उनकी सब्ज़ी मंडी में भी सत्तर-अस्सी चल रही है, पेट्रोल-डीज़ल उनकी भी बारह बजा रहा है। एक तुम्हीं नहीं हो जिसे महँगाई डायन खाए जा रही है। यह बात अलग है कि वे पूरे के पूरे घी की कड़ाही में तर हैं।
बकवादी बकवास कर रहे हैं कि जब सन्तानवे फीसदी आम जनता औसत बीस रुपट्टी रोज़ पर गुज़र-बसर कर रही है तो ये जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कौन से लाट साहब हैं जो उनकी तनख्वाह हज़ारों-लाखों में हो.......! अरे, जनता को बीस ही रुपए रोज़ मिल रहे हैं तो इसमें बेचारे जनसेवकों का क्या दोष! बीस रुपए क्या अगर बीस पैसे भी मिलें तो इसमें उनका क्या कसूर ! अंबानी भाइयों को करोड़ों रुपया महीना मिलते हैं तो क्या उसमें भी उन बेचारों का दोष है! मूर्खों, क्या वे लोगों की तनख्वाहें, मजदूरी तय करने के लिए संसद में बैठे हैं! और कोई दूसरा काम नहीं है उनके पास। कितने महत्वपूर्ण काम उनके कंधों पर हैं, कार्पोरेट घरानों का खयाल रखना पड़ता है, उनके हितों के लिए ईंट से ईंट बजानी पड़ती है, खुद कभी स्कूल में सवालों के जवाब न लिखें हों मगर संसद में भाँति-भाँति के सवाल बनाकर उठाना पड़ते हैं, सवालों का ‘हिसाब किताब’ रखना पड़ता है। देश की समस्याओं के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए कुर्सियाँ तोड़नी पड़ती हैं, माइक फेंकने पड़ते हैं, एक दूसरे का सिर तोड़ना पड़ता है, क्या कुछ नहीं करना पड़ता। यह सब क्या मुफ्त में हो जाएगा ? भुट्टे भूनने के लिए तो कोई जन प्रतिनिधि बनता नहीं है ? इन्कम तो कुछ होना ही मंगता है ना!
यह तो बहुत ही नाइन्साफी है, देश सेवा के बदले चार पैसे अगर वे गरीब किसी से ले लें तो आपको दिक्कत, संसद में सवाल उठाने के अगरचे वे पैसे चार्ज कर लें तो आपको दिक्कत, स्विस बैंक में खाता रखें तो आपको दिक्कत, तो अब क्या अपनी तनख्वाह भी छोड़ दें ? भूखों मर जाए ? क्या चाहते क्या हो आप लोग, क्या अब लोग देश सेवा भी करना बंद कर दें ? क्या देश की आम जनता का नेतृत्व करना भी बंद कर दें ? साधु बनकर पहाड़ों में चलें जाएँ ? जनता को यू ही सड़क पर छोड़ दें ?
देखिए यह पैसा ये पगार हाथों का मैल है, किसी के हाथ कम मैले है किसी के ज़्यादा! इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है! फर्क सिर्फ इतना ही तो है कि हम खुद अपना हाथ मैला नहीं कर पा रहे हैं और वे दनादन किए जा रहे हैं! अगर वे अपनी मर्ज़ी से इतना भी ना कर सकें तो फिर लानत है दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र पर, नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे !
नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे
//व्यंग्य-प्रमोद ताम्बट//
जलकुकड़े देखना हो तो कोई भारत आए। अब बताइये, दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र की सबसे ताकतवर संस्था के सदस्यगण, महँगाई के बोझ से दबकर टेढ़े होने से बचने के लिए अगर अपनी पगार खुद बढ़ा लेते हैं तो इसमें जलने की क्या बात है। यह हमारे देश देश की विशेषता है, किसी को कुछ ज़्यादा ही हासिल हो जाए, भले ही वह तनख्वाह हो, बख्शीस हो, लूट में हिस्सा हो, भीख हो........तो दूसरे लोग धूँ-धूँ कर जलने लगते हैं।
देश के नेतृत्व की तनख्वाह बढ़ी देख जो ज्वलनशील लोग जल रहे हैं उनमें ज़्यादातर वे लोग हैं जो खुद भी तनखैये हैं और जिन्हें अपनी तनख्वाह खुद बढ़ाने का कोई अधिकार नहीं है। इन तनखैयों की भी बढ़ जाती, भले ही उतनी ना बढ़ती जितनी जनसेवकों की बढ़ी है, तो जलने की यह क्रिया उतनी लपटदार नहीं होती जितनी होती देखी जा रही है।
अरे जलकुकड़ों, ज़रा शर्म करो ! यह भी कोई बात होती है, आखिर वे देश के कर्णधार हैं, दाल उनके लिए भी सौ रुपए किलो हुई है, सब्ज़ियाँ उनकी सब्ज़ी मंडी में भी सत्तर-अस्सी चल रही है, पेट्रोल-डीज़ल उनकी भी बारह बजा रहा है। एक तुम्हीं नहीं हो जिसे महँगाई डायन खाए जा रही है। यह बात अलग है कि वे पूरे के पूरे घी की कड़ाही में तर हैं।
बकवादी बकवास कर रहे हैं कि जब सन्तानवे फीसदी आम जनता औसत बीस रुपट्टी रोज़ पर गुज़र-बसर कर रही है तो ये जनता के चुने हुए प्रतिनिधि कौन से लाट साहब हैं जो उनकी तनख्वाह हज़ारों-लाखों में हो.......! अरे, जनता को बीस ही रुपए रोज़ मिल रहे हैं तो इसमें बेचारे जनसेवकों का क्या दोष! बीस रुपए क्या अगर बीस पैसे भी मिलें तो इसमें उनका क्या कसूर ! अंबानी भाइयों को करोड़ों रुपया महीना मिलते हैं तो क्या उसमें भी उन बेचारों का दोष है! मूर्खों, क्या वे लोगों की तनख्वाहें, मजदूरी तय करने के लिए संसद में बैठे हैं! और कोई दूसरा काम नहीं है उनके पास। कितने महत्वपूर्ण काम उनके कंधों पर हैं, कार्पोरेट घरानों का खयाल रखना पड़ता है, उनके हितों के लिए ईंट से ईंट बजानी पड़ती है, खुद कभी स्कूल में सवालों के जवाब न लिखें हों मगर संसद में भाँति-भाँति के सवाल बनाकर उठाना पड़ते हैं, सवालों का ‘हिसाब किताब’ रखना पड़ता है। देश की समस्याओं के प्रति दुनिया का ध्यान आकर्षित करने के लिए कुर्सियाँ तोड़नी पड़ती हैं, माइक फेंकने पड़ते हैं, एक दूसरे का सिर तोड़ना पड़ता है, क्या कुछ नहीं करना पड़ता। यह सब क्या मुफ्त में हो जाएगा ? भुट्टे भूनने के लिए तो कोई जन प्रतिनिधि बनता नहीं है ? इन्कम तो कुछ होना ही मंगता है ना!
यह तो बहुत ही नाइन्साफी है, देश सेवा के बदले चार पैसे अगर वे गरीब किसी से ले लें तो आपको दिक्कत, संसद में सवाल उठाने के अगरचे वे पैसे चार्ज कर लें तो आपको दिक्कत, स्विस बैंक में खाता रखें तो आपको दिक्कत, तो अब क्या अपनी तनख्वाह भी छोड़ दें ? भूखों मर जाए ? क्या चाहते क्या हो आप लोग, क्या अब लोग देश सेवा भी करना बंद कर दें ? क्या देश की आम जनता का नेतृत्व करना भी बंद कर दें ? साधु बनकर पहाड़ों में चलें जाएँ ? जनता को यू ही सड़क पर छोड़ दें ?
देखिए यह पैसा ये पगार हाथों का मैल है, किसी के हाथ कम मैले है किसी के ज़्यादा! इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है! फर्क सिर्फ इतना ही तो है कि हम खुद अपना हाथ मैला नहीं कर पा रहे हैं और वे दनादन किए जा रहे हैं! अगर वे अपनी मर्ज़ी से इतना भी ना कर सकें तो फिर लानत है दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र पर, नकारा है वह प्रजातंत्र जो पगार तक नहीं बढ़ाने दे !
Saturday, October 9, 2010
भ्रष्टाचार मिटाओ देश बचाओ Bhrashtachar Mitao Desh Bachao
देश आर्थिक रूप से गुलाम हो गया है .............
एक आजाद देश की नदी, खदान जमीन, जंगल, जल, पहाड़, बीमा क्षेत्र बैंक और सार्वजनिक निगम तक को देशी-विदेशी कम्पनियों के हाथों बेचा जा रहा हैं। तब हम कैसे आजाद हैं ? एक समय इसे यह कहकर निजी हाथों से छिना गया कि यह 'राष्ट्र' की सम्पति है । इसी राष्ट्र की सुरक्षा के नाम पर हमने परमाणु बम तक बना डाला हमारी सैन्य शक्ति का आकार भी काफी बड़ा है। हमारा देश सैनिक व्यय के मामले में दुनिया में नवें स्थान पर है। जबकि मानव विकास सूचकांक में 134 वें स्थान पर है। जब हम सारे संसाधनों को बेच डालेगें तो हमारी आजादी, सम्प्रभुंता का मतलब ही क्या हैं ? फिर हम किसकी रक्षा करेगें। जो लोग सोचतें है कि गुलामी की घोषणा टी.वी. अखबारों से होगी अब ऐसा न ही होगा यह गुलामी अपने हुक्मरानों द्वारा लादी जायेगी।
इसी गुलामी के खिलाफ अपनी आजादी को बचाये रखने और अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार रखने के लिये देश भर में किसान, खेत मजदूर, आदिवासी जगह-जगह लड़ रहे हैं। 9 अगस्त 2010 को मऊ कलेक्ट्रट में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ दिवस पर आयोजित कार्यक्रम स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों को हक दो धरने को सम्बोधित करते हुए सच्ची मुच्ची के सम्पादक अरविंद मूर्ति ने कही उन्होंने कहा कि प्रकृति, पर्यावरण और जन संघर्षो को रोकने बचाने का एक मात्र तरीका है। स्थानीय संसाधनों स्थानीय लोगों का हक हो। परन्तु सरकार यह मानने को तैयार ही नही हैं। और वह इन सारे संसाधनों को देशी-विदेशी पूंजीपतियों को बेच रही है। इस पूरी लूट को देश की संसद के द्वारा वैधता दी जा रही है। जो खुद इनके हाथों बिक्री हुई हैं।
धरने को पी.यू.एच.आर. के जोनल सचिव वसन्त राजभर ने सम्बोधित करते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का प्रधानमंत्री जनता के द्वारा नहीं चुना जाता है। यह लोकतंत्र के लिये देश के लिये शर्म की बात है मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की तनख्वाह देश से नहीं लेते बल्कि अमेरिका से पेंशन लेते है। धरने को विजय सिंह हैवी ने सम्बोधित करते हुए कहाकि आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर निर्दोष गरीब आदिवासियों का सरकार कत्ल कर रही है जबकि वे अपने संसाधनों पर अपने हक की मांग कर रहे है। यह पूरी व्यवस्था अमीरों दंबगों के पक्ष में खड़ी है इसका ताजा उदाहरण शहर के नर्सिंग होम के मैले के टैंक में मरे तीन गरीब सीवर सफाई कर्मियों की मौत का हैं। जब यह काम कानून अपराध है। तो इसे करवाने वालो पर आज तक कार्यवाही क्यों नहीं हुई। धरने को हाजी अनवारूल हक, का रामनवल आदि ने भी सम्बोधित किया धरने में विनय कुमार, सुखराम राजभर, हाजरा खातून, अवधेश कुमार साहनी, राजकुमार, इनौस के का0 अर्जुन सहित कई प्रमुख साथी शमिल रहे धरने का आयोजन जन आन्दोलन का राष्ट्रीय समन्यव पी0यू0एच0 आर0 मूवमेंट फार राइट ने किया।
इसी गुलामी के खिलाफ अपनी आजादी को बचाये रखने और अपने प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार रखने के लिये देश भर में किसान, खेत मजदूर, आदिवासी जगह-जगह लड़ रहे हैं। 9 अगस्त 2010 को मऊ कलेक्ट्रट में ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ दिवस पर आयोजित कार्यक्रम स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों को हक दो धरने को सम्बोधित करते हुए सच्ची मुच्ची के सम्पादक अरविंद मूर्ति ने कही उन्होंने कहा कि प्रकृति, पर्यावरण और जन संघर्षो को रोकने बचाने का एक मात्र तरीका है। स्थानीय संसाधनों स्थानीय लोगों का हक हो। परन्तु सरकार यह मानने को तैयार ही नही हैं। और वह इन सारे संसाधनों को देशी-विदेशी पूंजीपतियों को बेच रही है। इस पूरी लूट को देश की संसद के द्वारा वैधता दी जा रही है। जो खुद इनके हाथों बिक्री हुई हैं।
धरने को पी.यू.एच.आर. के जोनल सचिव वसन्त राजभर ने सम्बोधित करते हुए कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश का प्रधानमंत्री जनता के द्वारा नहीं चुना जाता है। यह लोकतंत्र के लिये देश के लिये शर्म की बात है मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री पद की तनख्वाह देश से नहीं लेते बल्कि अमेरिका से पेंशन लेते है। धरने को विजय सिंह हैवी ने सम्बोधित करते हुए कहाकि आपरेशन ग्रीन हंट के नाम पर निर्दोष गरीब आदिवासियों का सरकार कत्ल कर रही है जबकि वे अपने संसाधनों पर अपने हक की मांग कर रहे है। यह पूरी व्यवस्था अमीरों दंबगों के पक्ष में खड़ी है इसका ताजा उदाहरण शहर के नर्सिंग होम के मैले के टैंक में मरे तीन गरीब सीवर सफाई कर्मियों की मौत का हैं। जब यह काम कानून अपराध है। तो इसे करवाने वालो पर आज तक कार्यवाही क्यों नहीं हुई। धरने को हाजी अनवारूल हक, का रामनवल आदि ने भी सम्बोधित किया धरने में विनय कुमार, सुखराम राजभर, हाजरा खातून, अवधेश कुमार साहनी, राजकुमार, इनौस के का0 अर्जुन सहित कई प्रमुख साथी शमिल रहे धरने का आयोजन जन आन्दोलन का राष्ट्रीय समन्यव पी0यू0एच0 आर0 मूवमेंट फार राइट ने किया।
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